Parents' Corner

विरासत दिवस

आज की पीढ़ी अपने देश के दर्शनीय स्थानों को कम जानती है।आज विश्व विरासत दिवस है । हम अपनी विरासत को तभी अच्छी तरह संभालेंगे, जब हम उसे जानेंगे ।

 

आज मैं अपने भोपाल दौरे के अनुभव को आपके साथ साझा करना चाहती हूँ । सन २०१३ के मार्च के महीने में मैं सपरिवार भोपाल गई ।  तीन दिन का समय कैसे गुज़र गया , पता ही नहीं चला ।

 

वहाँ का इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय श्यामला हिल्स की खूबसूरत पहाड़ियों पर करीब 200 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है । यहाँ बड़े बड़े प्रदर्शनी कक्षों मेंआदिवासियों के आवासों को, उनके बरतन, रसोई, कामकाज के उपकरण अन्न भंडार तथा परिवेश को हस्तशिल्प, देवी देवताओं की मूर्तियों और स्मृति चिह्नों से सजाया गया है। यहाँ का भ्रमण कर आप एशिया की जनजातीय विविधताओं को करीब से देख सकते हैं। यह अपने- आप में अनूठा है ।

 

संध्याकाल  हमने  अपर लेक में नौका विहार का आनंद उठाया ।  

 

दूसरी जगह है साँची । बौद्ध धर्मावलंबियों का यह पावन तीर्थ एक टीले की तराई में स्थित है और बौद्ध स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है। शांति, पवित्रता, धर्म और साहस केप्रतीक सांची के स्तूप बेहद सुंदर हैं । सम्राट अशोक ने इस स्थान का निर्माण बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु कराया था। यहाँ पहुँचकर एक अजीब- सी शांति महसूस होती है. यहाँ ऑडियो गाइड  भी उपलब्ध हैं जिससे आप यहाँ के पूरे इतिहास को जान सकते हैं । 

 

तीसरा स्थान है भीम बेटका । भीम बेटका भोपाल (मप्र) से कोई 50 किमी दूर है । यह एक पर्वतीय स्थल है, जहाँ बहुत सी प्राकृतिक गुफाएँ हैं । यहाँ की कोई  500 से अधिक गुफाओं में सैकड़ों प्रागैतिहासिक चित्र हैं । आदिमानवों ने गुफा की दीवारों पर विविध दर्शनीय चित्र अंकित किए थे । यहाँ के कुछ चित्र पचास हजार वर्ष पुराने हैं और जब आप यह सब अपनी आँखों से देखते हैं तो ऐसा लगता है कि आप अपने पुरखों को कितने क़रीब से जान पा रहे हैं । अपनी जड़ों को इतनी नजदीक से देखना एक सपने के समान लगता है । भीम बेटका को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर भी घोषित किया जा चुका है । 

 

कुल मिलाकर यह यात्रा अच्छी रही क्योंकि अंत में बच्चों ने कहा कि ऐसी जगहें  हमें कितना ज्ञान स्वतः दे देती हैं। ऐसे स्थानों के बारे में याद करने की आवश्यकता नहीं है , यह तो अब हमारे मानसपटल पर छप चुकी हैं ।

 

सच, भारत बहुत सुंदर है ! अपनी धरोहर से बच्चों को अवगत कराएँ ।

 

उषा छाबड़ा 
 १८.४.१६