gallery/name

Contest 1 Result


अत्यंत हर्ष के साथ सूचित किया जाता है कि  चित्र आधारित प्रतियोगिता (१) की विजेता सुहानी यादव हैं।

 
करें सफाई


गली सड़क सब साफ़ करें।
अपना मोहल्ला साफ़ करें।।
घर आँगन को सजाने वालों।
हाट बाज़ार को  साफ़ करें।।
कूड़ा करकट फेंकें डिब्बे में।
प्रतिदिन उसको साफ़ करें।।
पानी को ना कहीं रुकने दें।
नाली का कचरा साफ़ करें।।
ये देश हमारा अपना घर है।
गाँव शहर सब साफ़ करें।।
बीमारी वाले कीटाणु भगाएं।
'सुहानी' दुनिया साफ करें।।

 

नाम - सुहानी यादव

विद्यालय का नाम-  सर पदमपत सिंहानिया एजूकेशन सेन्टर कानपुर
आयु - १० वर्ष

gallery/2 (1)

Contest 2 Result

gallery/flower

यह जानकार आपको खुशी होगी कि इस बार दो कहानियों को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया है। विजेता रहीं वन्या अरोरा एवं मनस्वी नौटियाल। यह बड़ा ही रोचक लगा कि एक ही कहानी ने किस प्रकार बच्चों को विभिन्न प्रकार से प्रभावित किया। बच्चों के मन में अपने माता- पिता एवं शिक्षकों के लिए कितना आदर भाव है, यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई।


दोनों कहानियाँ इस प्रकार हैं -


प्यारी माँ
शिमला में एक मंजू नाम की अध्यापिका अपने दो बच्चो के साथ रहती थी। वह अपने बच्चों से बहुत प्यार करती थी और उनकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करती थी। मंजू की दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी- वह सुबह पाँच बजे उठकर बच्चों के लिए खाना बनाती और उन्हें तैयार करके अपने साथ स्कूल ले जाती। दोपहर तीन बजे स्कूल से वापस आकर कुछ देर आराम करने के बाद बच्चों को पढ़ाने लग जाती। मंजू को बच्चों की सेहत का हमेशा बहुत खयाल रहता था इसीलिए वह उन्हें एक घंटा बगीचे में खेलने जरूर ले जाती थी। हर माँ की तरह वह सब काम छोड़कर बच्चों की लिए वक़्त जरूर निकाल लिया करती थी।
ऐसा नहीं था कि बच्चे माँ की भावनाएँ नहीं समझते थे। बच्चे माँ की हर बात मानते थे और उनकी समझाई हर बात का ध्यान रखते थे जैसे झूठ न बोलना, आस पास सफाई रखना आदि। बारह आगस्त का दिन था और मंजू का जन्मदिन था। बच्चो ने भेंट में माँ को फूलों का गुलदस्ता दिया और एक कविता लिख कर माँ को धन्यवाद किया । यह सब देखकर मंजू की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ गए।


लेखिका : वन्या अरोड़ा
विद्यालय : दिल्ली पब्लिक स्कूल, रोहिणी
उम्र : ९ साल

 

ऊँची सोच, बुलंद इरादे
कुसुम नाम की एक औरत थी , जिसका एक बेटा था। समय और मजबूरी के कारण वह स्वयं पढ़ और लिख नहीं पाई थी और वह मज़दूरी करके अपने बच्चे का पालन -पोषण कर रही थी ! एक दिन उसने कुछ बच्चों को स्कूल जाते हुए देखा। उसने मन में ठान लिया कि जैसे भी हो वह अपने बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाएगी! उसका बच्चा स्कूल जाने लगा। प्रतिदिन घर आकर वह अपनी माँ को बताता कि आज उसने क्या पढ़ा। यह सुनकर वह बहुत खुश होती थी और जो भी उसका बच्चा पढ़कर आता, वह भी उसे पढ़कर थोड़ा - थोड़ा सीखने लगी। समय बीतता गया। एक दिन उसका बेटा आया और बोला, "माँ, आज मैं अपनी कक्षा में प्रथम आया हूँ और मुझे छात्रवृत्ति मिली है! अब मेरी पढ़ाई का सारा खर्च स्कूल देगा।" यह सुनकर माँ की आँखों में आँसू गए। दोनों ने मिलकर एक फूलो का गुलदस्ता बनाया। माँ ने अपने बच्चे को गोद में उठाया। दोनों अध्यापिका के पास गए जिसने उसकी मेहनत को सही दिशा दिखाई। दोनों ने उस अध्यापिका को धन्यवाद दिया !

नाम : मनस्वी नौटियाल
कक्षा : सातवीं
स्कूल : जे.एम्.जे सीनियर सेकंडरी स्कूल, पश्चिम विहार , नई दिल्ली
उम्र : ११ साल

Contest 3 Result

gallery/grandparents

संस्मरण लेखन प्रतियोगिता (३) में इस बार विजेता रहीं मिष्टी दुआ। 
आप  उनका संस्मरण - 'नानी का घर सबसे प्यारा' पढ़ सकते हैं -

 

नानी का घर सबसे प्यारा !

 

मुझे आज भी याद हैं, मेरी मासी की बेटी की शादी थी। गांव से बहुत से रिश्तेदार उनके घर रहने आये  थे। शादी से एक हफ्ते पहले से ही उनका घर बच्चों की चहचाहट से भर उठा था। मेरे लगभग सारे चचेरे भाई-बहन स्कूल से छुट्टी लेकर अपनी माताओं के साथ मासी  रहने चले गए थे। बस मैं ही अभी तक छुट्टी नहीं ले पा रही थी क्योंकि उस पूरे हफ्ते मेरी परीक्षाएँ थीं। अपनी परीक्षाएँ ख़तम होने के बाद मैं भी अपना बस्ता उठाए रहने के लिए चल पड़ी। मगर जब मैं वह पहुंची तो मैंने देखा कि कमरे में मेरे लिए ज़रा सी भी जगह नहीं थी। मेरी नानी पास में ही रहती थी, तो मेरी मम्मी ने उनके घर रहने का निर्णय लिया। पहली रात बिलकुल भी नींद नहीं आई, मैं अपनी बहनो के बारे में सोच रही थी...कितना मज़ा कर रहे होंगे वे! मेरी नानी को ए सी में सोने की आदत नहीं थी तो इसलिए ए सी भी बंद था। वह रात मैंने जैसे-तैसे बिताई। अगले दिन मैंने अपने घर जाने की ज़िद की मगर माँ ने मुझे समझाया कि नाना नानी भी तो अकेले हो जाएंगे। मैं रुकी रही।

 

अगली सुबह मैंने नानी से पूछा कि उनके पास कोई पुराना खिलौना था जिससे मैं खेल  सकूँ ( उनके घर में इंटरनेट नहीं था )। नानी ने मुझे अपनी अलमारी से ढूंढ़कर एक कैरम बोर्ड ढूँढ कर  मुझे दे दिया। मेरे पास खिलौना तो था मगर किसके साथ खेलती! नानी और माँ मासी का काम में हाथ बँटाने के लिए गई थी बस नानाजी घर पर थे। नानाजी भी बैठे - बैठे बोर गए थे, मैंने उनसे पूछा यदि वे साथ खेलेंगे। समय काटने के लिए, वे मान गए। खेल शुरू हुआ, नानाजी पुराने खिलाड़ी थे,  मैं भी कुछ कम न थी। मैं उन्हें बराबरी की टक्कर दे रही थी। खेल ख़तम हुआ, हम दोनों ही विजेता थे। मैंने नानी को फ़ोन करके मेरे भाई बहन को घर साथ लाने के लिए कहा। घंटी बजी, मैंने दरवाज़ा खोला, सब अंदर आ गए। हमने उन्हें भी कैरम बोर्ड खेलने के लिए कहा। बहुत मज़ा आया। बाद में सभी नानी घर रहने आ गए, मासी को भी आराम मिला। नानी का घर सबसे प्यारा!

 

नाम : मिष्टी दुआ
कक्षा : ७
स्कूल : डीपीएस रोहिणी