01 Nov

कहानी ‘ इंतज़ार ‘

Setu Bilingual सेतु  –  पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित द्वैभाषिक पत्रिका *  में छपी मेरी कहानी ‘ इंतज़ार ‘ 

Sunday, October 30, 2016

इंतज़ार (कहानी)

 – उषा छाबड़ा

रानी अपने घर में सोफे पर बैठी सोचे चली जा रही थी। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। बार-बार उसे राकेश की याद आ रही थी। राकेश जो कुछ वर्षों पहले ही विदेश चला गया था। शुरु-शुरु में तो उसकी कुछ ई मेल आईं थीं पर अब उससे संपर्क टूट चुका है। राकेश से वह बहुत नाराज़ थी।दो महीने से उसका कोई अता-पता नहीं। जाने वह कहाँ है, कैसा है ! वहाँ बैठे-बैठे वह अपने ख्यालों में खो गई।
राकेश के साथ समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ जाता था। ऑफिस से उसके साथ ही निकलना और फिर उसके साथ घूमने निकल जाना। कभी किसी फिल्म को देखने, तो कभी अपने घर का कोई सामान खरीदने। कितनी ही मुलाकातें उसकी आँखों के सामने से निकल रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसके बिना अपना खाली वक्त कैसे बिताये!

जब से राकेश विदेश गया था, शाम को वह सीधा घर ही आती थी। घर क्या, बस चारदीवारी से घिरे दो कमरे! सिर्फ सन्नाटा और कुछ नहीं! घर की ओर देखने का मन ही नहीं करता था। उसकी जिंदगी अधूरी सी हो गई थी। थोड़ी बहुत सफाई की, कुछ बनाया, बुझे मन से खाया, किसी किताब के पन्ने पलटे, बस धीरे- धीरे आँखें बोझिल हुईं और नींद आ गई। कई बार तो आधी रात में ही नींद टूट जाती और फिर आने का नाम ही नहीं लेती। फिर राकेश को ई मेल लिखने बैठ जाती जिनका जवाब आने की उम्मीद भी अब शायद ख़त्म हो रही थी। था तो केवल इंतज़ार!

आज बाहर बहुत गर्मी बहुत पड़ रही थी। रविवार का दिन था। ऑफिस में भी तो छुट्टी थी। बहुत दिनों बाद घर की ओर ध्यान गया था उसका ! जगह जगह मकड़ी के जाले झूल रहे थे और उसे जैसे कभी दिखाई ही नहीं दिए थे। सुबह से वह घर की सफाई में लगी हुई थी। दोपहर तक तो थक कर चूर हो चुकी थी।

अभी- अभी वह सोकर उठी ही थी और खिड़की के पास आकर बैठ गई। उसने पर्दा हटाया और खिड़की से बाहर झाँका। शाम हो रही थी। बाहर देखा तो आसमान पर काले बादल एक ओर से घिर रहे हैं। बादलों के साए में सूरज ऐसे छिप रहा है जैसे कि वह राकेश के आगोश में चुपचाप छिप जा जाती थी। न चाहते हुए भी राकेश को वह अपनी यादों से जुदा नहीं कर पा रही थी।. वही तो था जिसने इस अनजान शहर में उसे सहारा दिया था। इस नए शहर में वह अकेली, नौकरी की खातिर आई थी। वह तो किसी को भी नहीं जानती थी। राकेश ने ही तो उसकी सूनी जिंदगी में रंग बिखेरे थे।

वह अब आँगन में आकर खड़ी हो गई थी। दूर पेड़ पर बैठी चिड़िया भी बार – बार अपने घोंसले से बाहर आ जा रही थी जैसे कि उसे भी बारिश का इंतज़ार हो। झुलसती गर्मी में वह भी बेहाल सी जान पड़ रही थी। देखते ही देखते ठंडी सी बयार चल पड़ी। पेड़ों की पत्तियाँ जैसे हवा के संग अठखेलियाँ कर रहीं थीं।
ऊपर काले बादल अलग-अलग आकार लिए उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे जैसे कि किसी अतिथि के आने का सन्देश दे रहे थे। सारे पेड़-पौधे भी इस सन्देश को सुन झूम पड़े थे।

सिर्फ पेड़-पौधे ही क्यों, क्या मनुष्य नहीं! नीचे चलते हुए लोग जिनके चेहरे पर कुछ समय पहले चिंता की लकीरें थीं, प्यास बुझाने के लिए जहाँ पानी बटोरने की जद्दोजहद में पड़े थे , वे भी बारिश के आगमन की ख़ुशी को अपने चेहरे से छिपा नहीं पा रहे थे। एक बार ऊपर देखते , प्रसन्न हो फिर आगे की ओर बढ़ जाते। टप! पहली बूँद गिरी , जिसे प्यासी धरती ने सोखने में एक पल भी नहीं लगाया, बूँद पूरी तह गायब हो गई। फिर, टप – टप- टप—- और जैसे कि किसी नृत्यांगना के पायल की झंकार सबको मदमस्त करने लगी हो।

नन्हीं बूँदे धरती की प्यास बुझा रही थी। रानी मौसम के बदलाव से मन में बदलाव महसूस कर रही थी। जैसे ही कुछ बूँदें उसके चेहरे पर पड़ी, उसे राकेश से मिलने का वह दिन याद आ गया जब ऑफिस के बाहर यूँ ही खड़ी थी और बारिश हो रही थी। राकेश भी उसके ऑफिस में ही काम करता था और उसके पास आकर उसने अपनी गाड़ी रोकी थी। राकेश ने ही उसे तेज बारिश में घर पर छोड़ा था। बारिश में राकेश के साथ हुई पहली मुलाकात कितनी हसीन थी। मन में कुछ न होते हुए भी पता नहीं क्या था जो कि बार-बार दस्तक दे रहा था।
बारिश अब तेज हो रही थी और कितना अच्छा लग रहा था रानी को ! आँगन में जैसे बारिश की बूंदें बेतहाशा गिर रही थीं जैसे कि कह रही हों कि लो तुम्हारा इंतज़ार ख़त्म हुआ ! नीचे सड़क पर धरती तृप्त होती दिखाई दे रही थी। आस-पास पत्तों पर बारिश की बूँदे गिर रही थी। नीचे देखा, जो लोग सड़कों पर थे, वे इकट्ठे होकर पेड़ों के नीचे खड़े हो रहे थे। सभी को घर पहुँचने की बेताबी थी, पर फिर भी भीगते हुए भी उस वर्षा का आनंद ले रहे थे।
तभी रानी ने देखा, दूर एक झोंपड़ी दिखाई दे रही थी, टूटी–फूटी सी! उसका छज्जा अंदर की ओर शायद चू रहा था। एक औरत कभी एक बर्तन लेकर किसी छेद के नीचे रखती तो कभी कोई बाल्टी लेकर अपने घर के किसी एक कोने की ओर भागती। कभी कोई सामान गीला होने से बचाती तो कभी कोई। चेहरे पर सिर्फ शिकन था , कैसे बचा पाएगी वह अपने इस टूटे- फूटे आशियाने को! बाहर जहाँ सब लोग वर्षा का आनंद ले रहे थे, वहीँ इस औरत के लिए ये बारिश की बूँदें चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर रही थीं।

उसका बच्चा इन सब बातों से बेखबर, अपने घर के बाहर खड़ा था। दीन – दुनिया से दूर, अपनी ही धुन में बारिश की टपकती बूँदों से तरह तरह बारिश की बूँदों से खेल रहा था। एक बूँद जैसे ही टपकती उसे अपनी उँगलियों से छिटका देता, अपने चेहरे पर पड़ती नन्हीं बूँदों को पोंछते जाता , खिलखिलाता हुआ हँसता । उसे कितना आनंद आ रहा था ! उसके चेहरे पर कितनी खुशी थी ! उसे सिर्फ अपना खेल समझ आ रहा था, बस खेल !

रानी भी उसे देखकर खिलखिला पड़ी। अपनी बातों को तो जैसे वह भूल ही गई। राकेश के प्रति उसके मन में जो मैल था, वह भी बारिश में धुल गया था। आगे बढ़ने का नाम है ज़िन्दगी ! आज धरती में सोए कितने ही बीज जाग उठेंगे। परिस्थितियां जैसी भी हों, वे उगेंगे। चाहे तो पल- पल को बोझ समझ कर बिता दो या जीवन के पलों को आनंद से जी लो।

उसे भी राकेश को भूलना ही होगा! बारिश ने आज उसे नई राह दिखा दी थी। राकेश का इंतज़ार ख़त्म हुआ। वह अपने कमरे में मुस्कराते हुए चली गई और बड़े ही चाव से अपना कमरा ठीक करने लगी।

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