29 Jun

कितना पैसा

 

कितना पैसा

Posted on  by hindilekhak

 

मधुर खिड़की के पास खड़ा बाहर देख रहा था। बाहर सुंदर-सुंदर मकान दिखाई दे रहे थे और बड़े-बड़े वृक्ष सड़क के दोनों के किनारे खड़े थे । मधुर इतना सब कुछ पा चुका था विदेश में आकर, लेकिन कहीं ना कहीं उसका दिल अभी भी वहीँ बसा था अपने मां-बाप के पास जिन्हें वह भारत  छोड़ आया था । कल की ही तो बात है । यहाँ कई भारतीय थे जो होली खेल रहे थे , पर माता- पिता के साथ यूँ ही समय बिताना भी अच्छा लगता था । कल तो वह सबके बीच होने पर भी कितना अकेलापन महसूस कर रहा था ।
उसके पिताजी शुरु से ही क्रोधी  स्वभाव के थे । वे बहुत जिद्दी भी थे ।  जल्दी से किसी की बात नहीं मानते थे । उसने तो पिताजी को मनाने की कोशिश भी की कि वे भी साथ चलें पर वे नहीं माने । मधुर जानता था कि उन्हें साथ लाना इतना आसान नहीं है खर्च बहुत बढ़ जाएगा, लेकिन उन्हें साथ आने के लिए कहना तो उसका फ़र्ज़ था ।
उसे याद है जब भी उसे कोई चीज खाने की पसंद नहीं आती तब माँ खाना खा रही हो तो भी  बीच में  ही खाना छोड़कर रसोई की तरफ जाती और उसका मनपसंद खाना बनाती । आज वह अपनी मां को वहीँ  छोड़कर विदेश में अपने परिवार के साथ रह रहा है । जल्दी  फोन भी नहीं करता क्योंकि एक ही प्रश्न पूछा जाता है, कब आ रहे हो बेटा?
उसे पता चला है कि उसके पिताजी की आँखों का ऑपरेशन होने वाला है । पहले भी कुछ महीनों पहले  जब उसके पिता के घुटनों का ऑपरेशन हुआ वह नहीं जा पाया था । यहाँ भी उसे नींद कहाँ आती थी! उसे याद है पिताजी किस प्रकार लेटकर उसे पावों से झूला झुलाते थे,
अब भी उसके पिताजी की आँखों का ऑपरेशन है और वह अपने परिवार के साथ विदेश में रह रहा है. सभी लोग यह समझते हैं कि उसे अपने माता – पिता की परवाह नहीं । पर मधुर जानता है क्यों ? कितना मजबूर है वह ! वह नहीं आ सकता । अभी हाल ही में तो  यहाँ आकर बसा  है । वहां पर खर्च बहुत है और विदेश से भारत आना इतना आसान थोड़े ही है । फिर वह कुछ सोच कर कुर्सी पर बैठ जाता है । उसके मन में यह बात आती है कि भारत  कितने दिन रहेगा ? दो  दिन या तीन  दिन, फिर से वापस वापस आना ही होगा और इतने दिनों का खर्च भी कितना हो जाएगा । कोई फायदा नहीं । उसे याद है उसके घर के पास एक भइया रहते हैं ,बहुत अच्छे हैं वह उसके  मां-बाप का तो पूरा ध्यान रख लेते हैं । उन्हीं को फोन कर दूँगा । वह सब संभाल लेंगे। अब चिंता नहीं ।
मधुर के माता- पिता मधुर की स्थिति को जानते हैं पर दिल तो आखिर दिल है ।
मधुर को क्या पता उसके माता पिता उस दो-तीन दिनों में भी कितनी खुश हो जाएँगे उनकी आँखे तरस गई है अपने पुत्र को, अपने बच्चे  को देखने के लिए । वह क्यों नहीं समझता है । उसकी अपने माता  पिता के  प्रति  जिम्मेदारियाँ भी है । क्या हुआ जो पैसे खर्च हो जाएँगे ! कम पैसों में उन लोगों ने किस तरह मधुर की परवरिश की । क्या उसे छोड़ दिया था उन्होंने? आज भी जब फोन की घंटी बजती है दोनों लपक कर उठाते हैं शायद मधुर का फोन हो । लेकिन नहीं , कभी दूकानदार का फोन होता है तो कभी नल की मरम्मत करने वाले का । मधुर का फोन आए तो अरसा बीत गया है ।
मधुर के पिताजी तो बस अपनी दुनिया में ही खो गए हैं, उन्हें सिर्फ अपनी चिंता है, ऑपरेशन कब होना है , कहाँ होना है कैसे जाना है , डॉक्टर से बात हुई क्या, दिन में कितनी ही बार पड़ोस में रह रहे रमेश को फोन कर डालते हैं । रमेश कई बार झुंझला जाता है पर फिर सोचता है , चलो कोई बात नहीं । वह नहीं  करेगा तो कौन करेगा । कोई उपाय भी तो नज़र नहीं आता ।
मधुर की माँ तो समय से पहले ही बूढ़ी  हो गयी है । जब से मधुर के पिताजी का घुटनों का ऑपरेशन हुआ है , उनका घर से निकलना ही बंद हो गया है। वे नीचे ही नहीं उतरती. सब्जी वाला, दूध वाला सब घर पर ही सामान दे जाते हैं , फोन करते ही हाजिर । बस मधुर ही नहीं हाजिर हो पाता । खाने पीने का भी क्या है , एक ही बार में दो बार का काम हो जाता है । वैसे तो कोई उनके घर जल्दी नहीं आता, आकर भी कोई क्या करेगा, फिर वही पुरानी बातें , वही प्रश्न मधुर का फोन आया , वह  आ रहा है क्या, कब तक आएगा । कब तक सच को झुठलाते रहेंगे, कब तक इन प्रश्नों को झेलते रहेंगे!!
कभी कभार जब कोई आता है तो फट से उस सामान की ओर बढ़ जातीं हैं जो कोई अपने साथ लाता है । जीभ का स्वाद कम नहीं हुआ है, पति तो डायबिटीज के मरीज़ है पर वह तो नहीं, उन्हें  तो खाने पीने का शौक है । पर समय से पहले ही जैसे किसी ने उन इच्छाओं को दबा दिया है । पर इच्छाएं कहाँ दबती है, जीभ तो किसी की भी सगी नहीं होती, तो उनकी भी नहीं ।
एक तरफ मधुर है जो विदेश चला तो गया है,  अपने माता- पिता से मिलने के लिए इतना खर्च उठा पाने में सक्षम  नहीं , अपने परिवार को देखे या अब पिछले सम्बंधोॱ को । दूसरी तरफ उसके पिता हैं, जो वास्तविकता से भली- भांति परिचित हैं , बेटे के  आने की उम्मीद छोड़ चुके हैं, भूलने की बीमारी में अपने बेटे की यादें भी शायद धुंधली हो रहीं हैं, और तीसरी ओर उसकी माँ है, जो रह- रह कर बातों ही बातों में कई बार मधुर का नाम ले लेती है, उन्हें  उसके आने की उम्मीद अभी भी है, आखिर माँ जो ठहरी!! माँ तो  माँ ही होती है । पैसे कमाने की धुन ने सबको अलग कर दिया है! आखिर कितना पैसा चाहिए आदमी को!!!
लेखक / लेखिका : उषा छाबड़ा

 

 

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